आज शांत हो के इतना बह रही हो क्यों
शायद लहरों ने उनके पाँव को छू लिया होगा ,
हवा क्यों किसी शाख को हिलाती अब नही
लगता है उन्होंने जुल्फों को झटक दिया होगा ,
शाम हो चुकी है पंछी चह -चहाते क्यों नही
लगता है उनके ओठों से कोई नॉहा सुन लिया होगा ,
क्यों बादल अब इतना घनघोर बरसते हो
शायद बूंदों ने उनके बदन को छू लिया होगा,
मौत आ आ के लौट जाती क्यूं दामन से मेरे
शायद उन्होंने कभी दुआओं में 'मुझको' मांग लिया होगा,
