Tuesday, August 4, 2009

न बदला है न बदलेगा ...

सूरज वही चाँद वही सदियों से दबे लोगो के नाम यही
न बदला है न बदलेगा गीता वही है कुरान वही,
वक्त कितने निशानों को छोड़ गया
गंगा की हर एक लहर का इतिहास वही,
हर युग सजदे में झुका है, एक खुदा के सओ नाम वही
कुछ भी बदला नही प्यारे ये जमीं वही आसमान
बेशक दिखाईये रुतबा अपना, हक़ दिखाइए पर गुमान नही

मौजे हवा क्या काम कर गई ...


कल मौजे हवा क्या काम कर गई

मेरी मय्यत से इक गुल पंखुरी उड़ाके ले गई

ले जा के उसको डाला दामने- यार के

छूने से उनके उसकी खुश्बू बढ़ गई

क्या खूब था नजारा इक तरफ़ लोग रो रहे थे

उधर हथेली पे रख के पंखुरी सनम झूमते थे

मुफ्लिश था मैं जो जी के उसे दे सका न कुछ

मर कर मौजे हवा ने पंहुचा दी मेरी निशानी

इश्क को कभी ........


इश्क को कभी हमने भी आजमाया था

उस जानिशा से कभी हमने भी दिल लगाया था

आँखों में उसकी सूरत सब होश थे उड़े

रातो में जागते हुवे कभी अपने को पाया था

वो साथ दे सका न ये और बात है

पर वो दुनिया से मुँह छुपायेगा, उसके जी में क्या आया था

ऐ बशर तुम कहना न बेवफा उसे

उसने तो जाते हुवे भी मेरे तरफ़ हाथ बढाया था

मैं डूबा हु उसके दर्द में शबे -शाम से

कल उस मरहूम की यादों ने मुझे फिर से रुलाया था