Friday, September 11, 2009

जब अपनी पहचान रखना

जब कभी किसी से अपनी पहचान रखना
एक लफ्ज में ही सदियों की दास्तान रखना

पूंछे जो तुम्हारी हसरते कोई
जेबों को खली बता कर , दिल में आसमान रखना

आए जो करीब तो लगा लेना गले
उसकी हैसियत से होके कम भी ,ख़ुद को सतो जहान रखना

अपनी तारीफ़ को बया करे तुमसे वो अगर
मगर तुम चुप रहके भी उसको हैरान रखना

करने लगे नफरत तुमसे अगर वो
तो तू भी अपने अन्दर के बेमेहर को ,चढ़ते आफताबके सामान रखना

2 comments:

  1. अपनी तारीफ़ को बया करे तुमसे वो अगर
    मगर तुम चुप रहके भी उसको हैरान रखना

    waah-wa !!
    ek aalim-faazil shakhsiyat ke qalam se
    nikle umdaa alfaaz . . .

    mubarakbaad qubool farmaaeiN .

    ---MUFLIS---

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  2. पूंछे जो तुम्हारी हसरते कोई
    जेबों को खली बता कर , दिल में आसमान रखना
    अपनी तारीफ़ को बया करे तुमसे वो अगर
    मगर तुम चुप रहके भी उसको हैरान रखना
    कितनी बडी बात कही है। लाजवाब रचना है बधाई

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