Tuesday, August 4, 2009

मौजे हवा क्या काम कर गई ...


कल मौजे हवा क्या काम कर गई

मेरी मय्यत से इक गुल पंखुरी उड़ाके ले गई

ले जा के उसको डाला दामने- यार के

छूने से उनके उसकी खुश्बू बढ़ गई

क्या खूब था नजारा इक तरफ़ लोग रो रहे थे

उधर हथेली पे रख के पंखुरी सनम झूमते थे

मुफ्लिश था मैं जो जी के उसे दे सका न कुछ

मर कर मौजे हवा ने पंहुचा दी मेरी निशानी

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